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शारीरिक मेहनत स्वास्थ्य का आधार है

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जैसे-जैसे विज्ञान की उन्नति हो रही है, नई-नई तकनीकों से जीवन आराम परक बनता जा रहा है, वैसे-वैसे ही स्वास्थ्य संबंधी अनेकों व्याधियां दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। जिस तेजी से सुविधा बढ़ती जा रही हैं उसी तेजी से दुविधा भी बढ़ती जा रही हैं। आज हालात ऐसे हो गए हैं कि सब कुछ मशीनों से हो रहा है अर्थात् हाथ-पैरों का सारा कार्य मस्तिष्क करने लगा है और यह सत्य बात है कि जब किसी का मूल कार्य बेसिक कार्य कोई दूसरा करने लगे तो फिर उसमें विसंगतियां ही पैदा होंगी, गड़बडि़यां पैदा होंगी।

आज छोटे-छोटे कार्य भी स्वचालित मशीनों के द्वारा होने लगे हैं और जब हाथ का कार्य कोई मशीन करने लगे तो हाथ में गति कहां से आएगी, प्रगति कहां से आएगी, उसमें हरकत कहां से आएगी, पसीने कहां से आएंगे और जब हाथ काम नहीं करेगा तो फिर शरीर कहां से काम करेगा, शरीर में कभी एक बूंद पसीना नहीं आएगा, त्वचा के सारे छिद्र अवरूद्ध हो जाएंगे, त्वचा में विकार पैदा हो जाएंगे, शरीर के अंग निष्क्रय हो जाएंगे और अनेकों बीमारियों से अवरूद्ध हो जाएंगे, ग्रसित हो जाएंगे।

शरीरिक परिश्रम न केवल व्यक्ति को चुस्त-दुरूस्त रखता है, स्वस्थ रखता है, जागरूक रखता है और मन को प्रसन्न रखता है बल्कि हिंसा, बल प्रयोग, प्रतिशोध, क्रोध, घृणा और अन्य मानवीय दुर्गुणों को भी दूर भगाता है, उनको पास में नहीं आने देता और इन सबका मतलब होता है जीवन में संतुलन, जीवन में आनंद, जीवन में सुख-शांति और जीवन में समग्र सफलता। लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आज जिस प्रकार से लोगों से संस्कृति दूर होती जा रही है, संस्कार दूर होते जा रहे हैं, सुख-शांति दूर होती जा रही है, प्रेम कहीं दूर जा चुका है, आत्मियता तो दूर-दूर तक दिखाई तक नहीं देती है तो उसी प्रकार शारीरिक परिश्रम भी तेजी से दूर होता जा रहा है।

इन सबका दुष्प्रभाव यह पड़ रहा है कि आदमी हिंसा से, गुस्से से और टेंशन से भरता जा रहा है। पहले उनका क्रोध हाथ-पैरों के माध्यम से पसीने के माध्यम से, सोच के माध्यम से प्रेम और सोहार्द में बदल जाता था, लेकिन आज इस प्रकार की हिंसा को कोई माध्यम नहीं मिलता है और वह अपना क्रोध अपनी हिंसा अपने घरेलू साधनों पर, अपने परिजनों पर, परिचितों और रिश्तेदारों पर निकालता है। यही कारण है कि देखो वही नकारात्मक सोच और बीमारी से ग्रसित लोगों से दुनिया भरी पड़ी दिखाई देती है जो अपने अस्तित्व की लड़ाई का कड़ा संघर्ष करते दिखाई दे रही है। आइए, इस हकीकत को समझें और परिश्रम न भी कर सकें तो योगा, कसरत और मेडिटेशन जरूर करें।

प्रेरणा बिन्दु:-
हाथ-पैरों की गतिशीलता मन-मस्तिष्क को भी गतिशील और स्वस्थ बनाती है, क्योंकि शारीरिक परिश्रम मन मस्तिष्क के सारे विकार दूर कर इनको सृजनशील और विनयशील बनाता है।




from Opinion - samacharjagat.com
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