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ऑनलाइन चुनाव अभियान भी चल रहा है जोर-शोर से

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भारत में इस बार के लोकसभा चुनावों में ऑनलाइन चुनावी अभियान जोर-शोर से हो रहा है क्योंकि चुनाव अभियान में इसकी काफी अहम भूमिका हो गई है। हालांकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के 2015-16 के आंकड़ों को देखें तो देश में घर पर इंटरनेट का इस्तेमाल सिर्फ 11 फीसदी से ज्यादा की ही आबादी करती है। पिछले साल यानी 2018 में जारी शुरुआती स्तर के डाटा से पता चलता है कि जाति, वर्ग और क्षेत्र के आधार इंटरनेट के उपयोग करने वालों में काफी असमानता है। इसका अर्थ यह हुआ कि 2019 के लोकसभा चुनावों में ऑनलाइन प्रचार और फेक न्यूज का प्रभाव पूरी आबादी के बजाए कुछ जगहों पर और कुछ निश्चित क्षेत्रों में बहुत ज्यादा होने की संभावना है।

एनएफएचएस (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण) ने 2015-16 में छह लाख से अधिक घरों का सर्वे किया था। यह संपत्ति और सुविधाओं के घरेलू स्वामित्व के डाटा का समृद्ध स्त्रोत है। पर इस डाटाबेस का उपयोग मुख्य रूप से स्वास्थ्य परिणामों के आकलन के लिए होता है। दूरसंचार नियामक ने हाल के वर्षों में इंटरनेट कनेक्टिविटी पर कई डाटा जारी किए हैं। पर एक ही घर में कई इंटरनेट कनेक्शन होने से विश्लेषण में समस्या आती है। 2015-16 में छह लाख से अधिक घरों का सर्वेक्षण किया गया था।

जिसमें इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाली आबादी का सर्वेक्षण किया गया था। इस सर्वेक्षण के अनुसार चंडीगढ़ में सर्वाधिक 60 फीसदी, पंजाब, हिमाचल में 42 फीसदी, मिजोरम में 39.8 फीसदी, जम्मू-कश्मीर में 32.3 फीसदी, त्रिपुरा में 5.6 प्रतिशत, दमन और दीव में 5.4 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश में 4 फीसदी, गुजरात में 3.8 फीसदी और लक्षद्वीप में 3 प्रतिशत इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। देश के 50 जिलों में एक तिहाई आबादी के पास इंटरनेट की पहुंच है।

घर पर इंटरनेट का उपयोग करने वाले लोग उत्तर भारतीय बेल्ट पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ और दिल्ली में ज्यादा है। वहीं जम्मू-कश्मीर, मिजोरम और नगालैंड में भी इनकी संख्या ज्यादा है। हालांकि ये राज्य सर्वेक्षण नमूनों के लिए काफी छोटे हैं। यह सर्वे देश के 123 जिलों में किया गया, जिसमें एक चौथाई से ज्यादा घरों में इंटरनेट की पहुंच है।




from Opinion - samacharjagat.com
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