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प्रियंका गांधी की एंट्री से क्या SP-BSP अपनी रणनीति बदलेगी?

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लखनऊ में प्रियंका गांधी की धमाकेदार एंट्री हुई है. राजनीति में टाइमिंग अहम है. कई दशकों बाद कांग्रेस के रोड शो की टाइमिंग भी कमाल की रही है. इस रोड शो के जरिए कांग्रेस में जान फूंकने की कवायद भी कारगर साबित हुई है. कांग्रेस के वर्कर उत्साहित हैं. जिस तरह से कांग्रेसी इकट्ठा हुए हैं. उससे पार्टी तो खुश है. प्रियंका गांधी का असर गठबंधन पर ज़रूर हो रहा है. कांग्रेस का मज़बूत होना ही गठबंधन के लिए नुकसानदेह है. बदले माहौल में SP-BSP नई रणनीति बनाने की कवायद कर रही है. उसकी कोशिश अब कांग्रेस को साथ जोड़ने की है. वैसे प्रियंका का आना BJP के लिए गुड न्यूज़ नहीं है. BJP की परेशानी है कि जो वोट 'सबका साथ सबका विकास' वाला है वो छिटक सकता है. केंद्र और राज्य सरकार से नाखुश तबका प्रियंका गांधी की वजह से कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हो सकता है. SP-BSP पर दबाव कांग्रेस के इस हुजूम से SP-BSP पर दबाव बढ़ गया है. पहले उनका मानना था कि कांग्रेस सिर्फ दो सीट के लायक है. अब उनका दांव उल्टा पड़ गया है. SP-BSP भी नए खतरे को भांप रहे हैं. उनको पता है कि कांग्रेस के अचानक यूपी में सक्रिय होना उनके लिए राजनीतिक तौर पर फायदेमंद नहीं है. अभी तक दूसरे दल कांग्रेस को कमज़ोर आंक रहे थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. कांग्रेस पार्टी नए सिरे से खड़े होने की कोशिश कर रही है. प्रियंका ने अपनी राजनीतिक पारी यूपी से शुरू करने का फैसला किया है. ऐसे में कांग्रेस का पूरा अमला और संसाधन यूपी में लगाया जाएगा, जो निश्चित गठबंधन के लिए चिंताजनक है. गठबंधन को खतरा अखिलेश यादव और मायावती के मजबूत गठबंधन को प्रियंका गांधी से पहले कोई चुनौती नहीं थी. लेकिन पीजी के लखनऊ में दस्तक देते ही माहौल में तब्दीली दिखाई पड़ रही है. पब्लिक के पास अब गठबंधन का विकल्प है. पहले कांग्रेस लड़ाई से बाहर थी. जिसका फायदा उठाना अब कांग्रेस का काम है. गठबंधन के साथ दिक्कत है कि दोनों दल 42-42 सीटों पर चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. इससे इन दल के कद्दावर नेताओं के पास पहले BJP का ही विकल्प था.अब कांग्रेस ने भी गंभीर चुनौती पेश की है. कांग्रेस की राजनीति पिछलग्गू से निकलकर ड्राइविंग सीट पर बैठने की है. इसलिए राहुल गांधी ने फ्रंट फुट पर खेलने की बात कही है. ज़ाहिर है कि प्रियंका की वजह से SP-BSP का गेम गड़बड़ हो गया है. वॉकओवर जैसी स्थिति नहीं है. हर सीट पर मज़बूत त्रिकोणीय मुकाबला होने की संभावना है. कांग्रेस को साथ ना रखना गलती SP-BSP में सबसे ज्यादा मायावती का कांग्रेस से विरोध है. मायावती कांग्रेस को गठबंधन में नहीं रखना चाहती है. बिना मायावती के अखिलेश चलना नहीं चाहते है इसलिए एकतरफा गठबंधन का ऐलान किया गया था. लेकिन बदलते हालात में चर्चा फिर शुरू हो रही है. कांग्रेस के साथ नई रणनीतिक चर्चा पर बातचीत हो सकती है. कांग्रेस के लिए बीच का रास्ता मुफीद हो सकता है. कांग्रेस को चुनाव बाद के समीकरण पर भी ध्यान देना है. लेकिन बीच का रास्ता निकालना आसान नहीं है. गठबंधन अब टैक्टिकल सेंटिग की बात कर रहा है जिसमें दोनों ही दल को कम से कम नुकसान हो, ज्यादा नुकसान BJP को हो. कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी हर लोकसभा के समीकरण पर बात करने वाली है. इसमें जातीय समीकरण पर ध्यान ज़रूर दिया जाएगा. प्रियंका गांधी अपर कास्ट को तरजीह तो देंगी लेकिन कोई भी रणनीति गठबंधन और BJP के संभावित उम्मीदवार को ध्यान में रखकर ही बनाया जाएगा. कांग्रेस का वोट अभी गठबंधन के वोट की तरह फिक्स नहीं है. इस पार्टी से वो लोग ज्यादा जुड़ सकते हैं जो BJP और गठबंधन दोनों के साथ नहीं जाना चाहते हैं. लेकिन ये वोटर अपनी मर्ज़ी का मालिक हैं. ये वोट ट्रांसफेरेबल नहीं हैं. इस वजह से गठबंधन से फायदा कम है. लेकिन टैक्टिंगल सेटिंग में दोनों का फायदा है. तराई में कांग्रेस यूपी का तराई बेल्ट जो खेतिहर इलाका है, वहां 2009 में कांग्रेस को 13 सीट मिली थी. ये पूरा इलाका किसानों का है. यहां हर जाति का व्यक्ति किसानी के पेशे से जुड़ा है. तराई में अभी BJP का दबदबा है. 2014 में मोदी लहर में सभी समीकरण ध्वस्त कर दिया था. धौरहरा, खीरी से कुशीनगर तक कांग्रेस के लिए ये ज़मीन ज़रखेज़/उपजाऊ है. लेकिन 2009 में बेनी प्रसाद वर्मा के रहने से कुर्मी वोट कांग्रेस के खाते में आ गया था. लेकिन अब स्थिति है कि तराई में किसी बड़े स्थानीय नेता का अभाव है. इसलिए हर सीट के हिसाब से खाका तैयार करना पड़ सकता है. तराई के इलाके में गठबंधन में SP मज़बूत है. BSP के ज्यादातर नेता BJP में चले गए हैं. कांग्रेस भी हर दल के बागी पर नज़र बनाए हुए है. पूर्वी यूपी में कांग्रेस वाराणसी प्रधानमंत्री का संसदीय इलाका है. यहां के आसपास की सीट BJP के पास है. BJP से ही गठबंधन को सीट खींचनी और कांग्रेस को भी वहीं से सीट बढ़ानी है. वाराणसी एक प्रतीकात्मक सीट है. कांग्रेस के पास ये सीट 2009 में थी. इस तरह इलाहाबाद/प्रयागराज की सीट है. जहां कांग्रेस कई बार से नहीं जीत पा रही है. [caption id="attachment_152474" align="alignnone" width="1002"] Jabalpur: Congress President Rahul Gandhi greets his supporters during a roadshow, in Jabalpur, Saturday, Oct 6, 2018. (PTI Photo) (PTI10_6_2018_000152B)[/caption] फूलपुर की सीट कांग्रेस की परंपरागत सीट है.लेकिन यहां भी स्थिति यही है.जहां तक पूर्व का सवाल है. आज़मगढ़ और बलिया के आसपास कांग्रेस को खाता खोलना है. कुल मिलाकर अवध का इलाका ऐसा है, जहां कांग्रेस को ज़रूरी ऑक्सीजन मिल सकता है. कानपुर 2014 से पहले कांग्रेस के पास थी.पश्चिमी यूपी में भी कई सीट पर कांग्रेस मज़बूत है. इसमें लखनऊ, बाराबंकी, फैज़ाबाद और देवीपाटन मंडल की चार सीट है. यहां कई कद्दावर नेता हैं, जिनकी घर वापसी कराना कांग्रेस करा लेगी तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है प्रियंका लड़ेगी चुनाव? प्रियंका गांधी माहौल बनाने के लिए अमेठी रायबरेली में किसी एक सीट से चुनावी समर में उतर सकती है. ऐसा करने से फैज़ाबाद और लखनऊ मंडल पर असर पड़ सकता है. लखनऊ में पिछले चुनाव से कांग्रेस नंबर दो पर है.ऐसे में कांग्रेस के पास लखनऊ में मज़बूत उम्मीदवार सीट निकाल सकता है. 2022 की तैयारी? राहुल गांधी ने कहा कि प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए असली लड़ाई 2022 में है. लोकसभा चुनाव तो सिर्फ कांग्रेस के लिए एक बानगी है. ज़ाहिर है राहुल गांधी को पता है कि वक्त कम है. लोकसभा चुनाव में ओपनिंग तो करा दी है, लेकिन नाइट वॉचमैन की भूमिका से ज्यादा अभी कुछ नहीं है. ये बात दीगर है कि नाइट वॉचमैन के लिए मज़बूत प्लेयर उतारे हैं. जो कांग्रेस की पारी की शुरुआत अभी करेंगें लेकिन विजयी शॉट विधानसभा चुनाव में मारेंगे. कांग्रेस की इस रणनीति में दम है. 2007 से ये पूर्ण बहुमत की तीसरी सरकार है. इससे पहले SP-BSP की सरकार को जनता देख चुकी है. ये कहा जा सकता है कि जो यूपी में 1980 के बाद पैदा हुआ है, उसने अपने होश में कांग्रेस की सरकार को नहीं देखा है.1989 में कांग्रेस ने आखिरी बार सरकार थी. ज़ाहिर है कि इस नई नस्ल के बीच कांग्रेस अपनी पैठ बना सकती है. जो जनता की ख्वाहिश है उसको कांग्रेस अपने में मिला सकती है.


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