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मुजफ्फरनगर पर फैसला

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मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) में 2013 में हुई दो चचेरे भाइयों की हत्या के आरोप में एक स्थानीय न्यायालय ने सात जनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अगस्त 2013 में हुई इस वारदात के बाद एक अन्य समुदाय के युवक की हत्या हो गई थी। इसके बाद सितंबर माह में एक महापंचायत से लौट रहे लोगों पर हमला हुआ, जिसने साम्प्रदायिक दंगे का विकराल रूप धारण कर लिया। हिंसा में 62 लोग मारे गए थे और लोग गांवों को छोड़कर भाग गए थे। करीब 50 हजार लोग विस्थापित हुए थे। 20 साल में पहली बार सेना को तैनात करना पड़ा था। घटना की जांच के लिए न्यायिक आयोग भी बना। न्यायाधीश विष्णु सहाय आयोग ने दंगों के लिए गुप्तचर एजेंसियों की विफलता तथा उच्च अधिकारियों के ढीले रवैए को दोषी पाया। पूरे देश को हिला कर रख देने वाली इस घटना पर लगातार राजनीति होती रही है। दोनों समुदायों के नेता अपने लोगों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की राज्य व केन्द्र सरकार से मांग करते रहे हैं। अब छह साल बाद फैसला आया है। वह भी एक मामले में। इन दंगों को लेकर करीब छह हजार मामले दर्ज हुए थे और 1480 गिरफ्तारियां हुई थीं। अभी तक क्षेत्र में सद्भाव पूरी तरह कायम नहीं हो पाया है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद, बिजनौर, शामली, खतौली और मुजफ्फरनगर जिलों में साम्प्रदायिक तनाव की खबरें सामने आती रहती हैं। गन्ने, चावल और गेहूं की खेती के साथ आम के बागों के लिए मशहूर इस क्षेत्र में जाट और मुस्लिम जमींदारों का दबदबा है। फैसला ऐसे समय आया है जबकि आम चुनाव आसन्न हैं। प्रदेश सरकार को इस संवेदनशील इलाके में आने वाले दिनों में अत्यधिक सतर्कता बरतनी होगी। क्योंकि वोटों के ध्रुवीकरण के लिए माहौल बिगाडऩे के प्रयास किए जा सकते हैं। पहले ही अयोध्या विवाद को लेकर अदालती लड़ाई के साथ बयानों के तीर चल रहे हैं। चुनाव नजदीक आने के साथ इनमें और तेजी आ सकती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माहौल का समूचे उत्तर प्रदेश पर ही नहीं, बल्कि पूरे देश पर असर पड़ता है।

योगी आदित्यनाथ की सरकार को चाहिए कि अन्य मामलों पर भी त्वरित कार्रवाई कर न्यायालय में चार्जशीट पेश कराई जाए, ताकि सभी पीडि़त पक्षों को स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय मिल सके। लोकतंत्र के तीनों स्तंभों में न्यायपालिका ही एक मात्र ऐसा स्तंभ है, जिस पर देश का हर समुदाय और नागरिक पूर्ण भरोसा करता है। हमारे देश में बड़ी-बड़ी घटनाओं के होने के बाद जांच आयोग तो गठित कर दिए जाते हैं, लेकिन इनकी प्रक्रिया इतनी लम्बी और जटिल होती है कि परिणाम सामने आने में दसियों साल लग जाते हैं। राजस्थान में मेहरानगढ़ हादसा, उत्तर प्रदेश में हरिद्वार कुंभ हादसा, उत्तराखंड में नैना देवी भगदड़ हादसा और मध्यप्रदेश में यूनियन कार्बाइड कांड पर आयोग तो बने, करोड़ों रुपए इनकी जांच प्रक्रिया पर खर्च भी हुए, लेकिन इनकी रिपोर्टों पर निर्णय अभी तक लम्बित हैं। सरकारें अपने हित और समय के आधार पर फैसले करती हैं। पहले जांच आयोगों और फिर सरकारों की ओर से देरी के कारण स्वाभाविक है कि आमजन में असंतोष और अविश्वास उपजता है जो कि किसी भी व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।




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