खोखले दावों का बाजार - social Gyan

Post Top Ad

Responsive Ads Here

खोखले दावों का बाजार

Share This

बाजार में शुगर फ्री का दावा करने वाली कंपनियों के खाद्य व पेय पदार्थ में मिलाए जाने वाले स्वीटनर में भी चीनी जैसे ही नुकसान हैं। ब्रिटिश मेेडिकल जनरल में इस संबंध में प्रकाशित शोध सचमुच चौंकाने वाला है। वह भी ऐसे दौर में, जबकि भारत समेत दुनिया के दूसरे देशों में मधुमेह यानी डायबिटीज तेजी से फैल रही है, और चीनी के विकल्प के रूप में करोड़ों लोग ऐसे उत्पादों का इस्तेमाल करने लगे हैं जिन्हें शुगर फ्री बताया जाता है। अध्ययन का यह निष्कर्ष सचमुच खतरे की घंटी बजाने वाला है। शुगर फ्री बताए जाने वाले उत्पाद फायदेमंद होने के बजाए नुकसान देने वाले साबित हों तो इन्हें बाजार में प्रचारित करने वाली कंपनियों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होना लाजिमी है। बात केवल शुगर फ्री बताए जाने वाले ऐसे उत्पादों की ही नहीं है, बल्कि सेहत के लिए खतरनाक समझे जाने वाले ऐसे तमाम दूसरे खाद्य पदार्थों की भी है, जिन्हें बाजार में धड़ल्ले के साथ बेचा जा रहा है। समय-समय पर ये अध्ययन भी सामने आते रहे हैं कि खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता के बारे में जो दावे किए जाते हैं, हकीकत में नतीजे उन दावों के ठीक विपरीत हैं। यानी लोगों के लिए सेहतमंद बताए जाने वाले उत्पाद किसी न किसी रूप में स्वास्थ्य को खतरा पैदा कर रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जिन उत्पादों को कंपनियां शुगर फ्री बताकर बाजार में उतार रही हैं, क्या उनका कभी कोई वैज्ञानिक परीक्षण कराया गया है कि इनका सेवन करने से शुगर के मरीजों को कोई नुकसान नहीं होगा। जवाब नहीं में है। फिर भी आकर्षक तरीके से परोसे जाने वाले विज्ञापनों के प्रभाव में लोग आ ही जाते हैं।

ज्यादा दिन नहीं हुए, जब बच्चों के टैल्कम पाउडर में कैंसर कारक तत्त्वों की पुष्टि और उस बहुराष्ट्रीय कंपनी पर अरबों रुपए के जुर्माने की खबर ने सबको हैरान-परेशान कर दिया था। बरसों से लोग वह महंगा पाउडर सबसे सुरक्षित मानकर शिशुओं के लिए इस्तेमाल करते रहे। इसके अलावा दुनिया भर में मोटापा कम करने, लंबाई बढ़ाने, दिमाग तेज करने और यौन क्षमता बढ़ाने तक का दावा करने वाले कई ऐसे उत्पाद कंपनियों ने बाजार में उतार रखे हैं, जिनके दावों पर संदेह लाजिमी है। प्रचार तंत्र में ये कंपनियां अपने उत्पादों की खासियत ऐसे तरीके से पेश करती हैं कि एक बार तो पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी धोखा खा जाए। वसा के बारे में ऐसा प्रचार किया जाता है, जैसे इसका सीधा संबंध मोटापे से हो। जबकि भोजन में पाए जाने वाले पोषक तत्त्वों में वसा की अपनी अहम भूमिका है, जिसे नकारा नहीं जा सकता है। समस्या तब ही होती है, जब वसायुक्त पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन हो। ऐसे में वसामुक्त खाद्य पदार्थ बेचने वालों ने अपना बाजार बना लिया है। विटामिन व प्रोटीनवर्धक कई फूड सप्लीमेंट बिना किसी वैज्ञानिक परीक्षण के तरह-तरह के दावे कर लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने में जुटे हैं। मल्टीनेशनल कंपनियों के ऑनलाइन कारोबार ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ाया है।

सवाल यह उठता है कि क्या खाद्य उत्पादों के बारे में तरह-तरह के दावे करने वाली कंपनियों का काम येन-केन-प्रकारेण अपने उत्पाद को बेचना मात्र ही है? यदि ऐसा है भी, तो क्या लोगों की सेहत से जुड़े चेतावनी संकेतक देना उनकी प्राथमिकता में शामिल नहीं होना चाहिए? क्या स्वास्थ्य से जुड़ी सरकारी एजेंसियों को ऐसे खाद्य पदार्थों के बारे में किए जाने वाले दावों की सत्यता की पड़ताल तत्परता के साथ अपने स्तर पर नहीं करानी चाहिए। इन सब सवालों का जवाब निश्चित ही हां में होना चाहिए। लेकिन लगता तो यही है कि इन उत्पादों की निर्माता कंपनियों के साथ-साथ सरकारी तंत्र ने भी जनस्वास्थ्य से जुड़े इस अहम मसले पर चिंता करना छोड़-सा दिया है। तभी तो भ्रामक विज्ञापनों की रोकथाम के लिए सिर्फ बड़े-बड़े दावे ही नजर आते हैं। कानून-कायदे बनते हैं लेकिन जब कार्रवाई की बारी आती है, तो नतीजा सिफर नजर आता है। कारण भी साफ है। फूड सप्लीमेंट व शुगर फ्री उत्पाद बेचने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियों ने ऐसा जाल फैला लिया है, जिसके शिकंजे से आम आदमी को निकालना इतना आसान नहीं है। गुणवत्ता और पौष्टिकता के दावों पर खरा नहीं उतरने वाली कंपनियों पर सख्ती किए बिना यह संभव नहीं।




from Patrika : India's Leading Hindi News Portal
आगे पढ़े ----पत्रिका

No comments:

Post a Comment

Post Bottom Ad

Responsive Ads Here