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सोच में भविष्य कहां

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अस्सी साल की शीला दीक्षित को दिल्ली में कांंग्रेस की कमान सौंपने का फैसला अनुभव को तरजीह दिया जाना है, मजबूरी है या श्रेष्ठतम विकल्प, यह राहुल गांधी से बेहतर दूसरा नहीं बता सकता। लेकिन कांग्रेस के इस फैसले के बहाने यह बहस लाजिमी है कि राजनीतिक पार्टियां अपने सांगठनिक ढांचे या लोकतंत्र की मजबूती के लिए भविष्योन्मुख रणनीति के लिहाज से किस धरातल पर खड़ी हैं। हालांकि न सिर्फ देश के दोनों सबसे बड़े दल कांग्रेस और भाजपा, बल्कि बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी या अन्य, कम से कम एक मायने में बराबर हैं कि अधिकतर राज्यों में उनकी दूसरी कतार का नेतृत्व धुंध में गुम है। इधर, कांग्रेस ने शीला को कमान सौंपी तो उसी दिन भाजपा ने भी बड़ा कदम उठाया। वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर दिल्ली बुलाने का फैसला कर लिया। लेकिन इन राज्यों में बीते दस साल में दूसरी कतार का नेतृत्व तैयार किया गया हो, ऐसा नजर नहीं आता। इस विषय में क्षेत्रीय दलों की हालत तो और भी ज्यादा खराब है।

दरअसल, पार्टियां अब हर फैसला आज की सहूलियत और तात्कालिक जरूरत के हिसाब से ही करती नजर आती हैं। उनके किसी निर्णय से भविष्य की बुनियाद मजबूत होती है, या नहीं, इसकी फिक्र राजनीतिक दलों को अब नहीं है। यही वजह है कि अब दलबदल ज्यादा आसान होता जा रहा है, क्योंकि पार्टियों में वैचारिक अंतर खत्म हो रहा है। जिताऊ फैक्टर को पकडऩे की रेस में सभी दल अब एक ही ट्रैक के हमसफर नजर आते हैं। आज की सुविधा का पैमाना इतना हावी है कि सभी नीतियां सत्ता की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमने लगी हैं। इसके लिए दीर्घकालिक देशहित या व्यापक समाजहित अब मायने नहीं रखते। भाजपा हो या कांग्रेस, इसकी फिक्र अब किसे है कि वोट हासिल करने के लोक लुभावन फैसलों के लिए धन कहां से आएगा, या किसी छूट की वजह से गंवाए जा रहे राजस्व की भरपाई कहां से होगी?

दूसरे, सभी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का गला घोंटा जा चुका है और फैसलों पर सवाल का हक अब हासिल नहीं है। भाजपा या कांग्रेस नेतृत्व से यह पूछने की हिम्मत कौन नेता या कार्यकर्ता कर सकता है कि किसी भी फैसले में पार्टी हित या समाज हित में से यदि एक का चुनाव करना हो, तो किसे चुनना चाहिए? जिस दिन ऐसे कड़वे सवाल अपने शीर्ष नेतृत्व से करने का हक कार्यकर्ता को मिल जाएगा, पार्टियां लोक लुभावन फैसलों की राजनीति करने के बजाय, दूरदृष्टिपूर्ण और व्यापक राष्ट्रहित के आधार पर ही निर्णय करने की राह पर चल पड़ेंगी। तब चुनाव घोषणा पत्रों में बेरोजगारी भत्ते की रकम की प्रतिस्पर्धा या कर्जमाफी की घोषणाओं से पहले रोजगार का रोडमैप या किसान की समृद्धि का बाजार आगे होगा। तब चुनाव से ठीक पहले जातियों को लुभाने के आरक्षित उपक्रम नहीं होंगे और कारोबारियों को टैक्स छूट के बजाय उपयुक्त लाभ-मार्ग उपलब्ध कराना सरकारों का एजेंडा होगा। चुने जाने के दिन से लेकर अगले चुनाव के दिन तक तब नीतियों में किसी भी तरह का विचलन नजर नहीं आएगा।

राजनीति में जब वास्तविक परिपक्वता आएगी तो 76 साल की कोई शीला दीक्षित चुनाव हारते ही पूरी तरह से सियासी परिदृश्य से बेदखल नहीं की जाएंगी। अनुभव का बेहतर उपयोग उनके साथ नए काबिल नेताओं को दीक्षित करने में होगा, तब ही नया नेतृत्व अपने पैरों पर खड़ा होगा। बहरहाल, हम सब को यह भी स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि राजनीति में नैतिकता के प्रति जनता भी उतना गंभीर नहीं है, जितना कि उसे होना चाहिए। वोट देने के बाद पांच साल तक सरकारों और राजनीतिक दलों को या तो हम उनके हाल पर छोड़ते आए हैं, या फिर चुनाव आने पर सजा या ईनाम तय करते आए हैं। हम किसी भी राजनीतिक दल के किसी किरदार के प्रति या तो आसक्ति पाल लेते हैं, या विरक्ति की हद तक चले जाते हैं, लेकिन दल या उसके किरदार की नीतियों के लिए हमारी जिस आलोचनात्मक नजर की जरूरत होती है, वह नदारद ही रहती है। तात्कालिक लाभ के आधार पर ताली पीटकर खुश होने के बजाय जब हम दलों से दीर्घकालिक नीतियों की अपेक्षा करेंगे, तो शायद पूरी राजनीति का इकोसिस्टम सुधार की राह पर आ सके।




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