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नेपाल की अनुकरणीय पहल

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नेपाल सरकार ने बुजुर्गो की इज्जत और उनके भरण-पोषण को लेकर ऐतिहासिक कानून बनाया है। जिसके हिसाब से हर रोजगार युक्त बच्चे की कमाई का 5 से 10 प्रतिशत तक सीधे उनके मां-बाप के खाते में चला जाएगा ताकि मां-बाप को भरण-पोषण के लिए किसी पर निर्भर न होना पड़े और परिवार में उनकी अपनी इज्जत बनी रहे। भारत में भी 2007 में मां-बाप और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल के लिए कानून बनाया गया है। अनुमान है कि 2026 तक भारत में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या कुल जनसंख्या की 12.40 फीसदी होगी।

कानूनी रूप से बच्चों की जिम्मेदारी होती है कि वे माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी उठाएं। विडंबना है कि बच्चे ऐसा नहीं करते। लेकिन जो मां-बाप कानून का सहारा लेते हैं, उन्हें ही यह सुविधा मिल जाती है। वरिष्ठ नागरिकों को कई मदों में छूट के बावजूद वे अकेले रहने को मजबूर है। उन्हें कोई भावनात्मक सहयोग नहीं मिलता और न ही कोई आय का साधन होता है। कभी संयुक्त परिवार बुजुर्गों के सुरक्षा कवच हुआ करते थे।

समय के साथ बच्चों के दिल भी बदल गए। अब वे नहीं मानते कि उनके पास जो कुछ भी है वह मां-बाप की देन है। तेज जिंदगी की रफ्तार में पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण करते हुए वे रिश्तों की गर्माहट तथा अपने मां-बाप की इज्जत करना भूल चुके हैं। आज बच्चे भूल चुके हैं कि मां-बाप उनके सिर पर छाया की तरह है, जिनके आशीर्वाद और प्रेरणाओं की वजह से ही वे आज यहां तक पहुंच पाए हैं। आज की तारीख में बच्चे मां-बाप को बोझ समझने लगे हैं। हर शहर में वृद्ध आश्रमों की बाढ़ आ गई है। जहां पर कुछ पैसे जमा करके मां-बाप को छोड़ दिया जाता है, जो कि अपनी पारिवारिक और मानसिक शांति खो चुके हैं। समाज में मां-बाप, दादा-दादी और बच्चों के बीच के रिश्ते अब अपने अर्थ खो रहे हैं। संयुक्त परिवार में जो एक आत्मिक बंधन था वह अब दिखता नहीं।




from Opinion - samacharjagat.com
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