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जीवन की सच्चाई

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पुरानी जरूर है लेकिन है बहुत सार्थक और प्रासंगिक। एक बार किसी गांव में एक युवक-महोत्सव था। उस महोत्सव के पास से भगवान बुद्ध कहीं जा रहे थे तो उनका ध्यान उस महोत्सव की तरफ गया और वे उसमें शामिल होने के लिए वहां गये। वहां उसने प्रथम बार एक बूढ़ा आदमी देखा। बुद्ध ने अपने सारथी को पूछा कि इस आदमी को क्या हो गया है? उस सारथीने कहा- यह आदमी बूढ़ा हो गया है। यह जवानी के बाद की अवस्था है। बुद्ध ने कहा कि अवस्थाएं भी होती हैं क्या? क्या मैं भी युवा के बाद बूढ़ा हो जाऊंगा? यह तो बड़ी अद्भुत बात है। बुद्ध ने सीधा यह पूछा कि कया मैं भी बूढ़ा हो जाऊंगा? जब आप किसी बूढ़े को देखते हैं तो क्या पूछते है अपने से कि मैं भी बूढ़ा हो जाऊंगा। आप सोचते हैं कि यह आदमी बूढ़ा हो गया है।

लेकिन यह घटना आपसे संबंधित नहींहो पाती। आपको यह नहीं दिख पाता कि इस आदमी के बूढ़े होने में मैं भी बूढ़ा हो गया हूं। जब एक फूल कुम्हलाकर गिरता है तो आप देखते हैं- फूल कुम्हलाकर गिर गया। लेकिन यह फूल का कुम्हलाना आपसे संबंधित नहीं हो पाता। क्या आपको यह दिखाई पड़ता है कि फूल के कुम्हलाने में आप भी कुम्हला गये अगर नहीं दिखाई पड़ता है तो प्यास कैसे पैदा होगी। बुद्ध ने कहा तब तो मैं भी बूढ़ा हो गया। रथ वापस ले चलो। इस महोत्सव में क्या करेंगे? मैं तो बूढ़ा हो गया हूं और यह युवा महोत्सव है। सारथी ने कहा आप कैसे पागल है। वह आदमी बूढ़ा हो गया है तो आप कैसे बूढ़े हो गये। तभी एक मुर्दे की लाश निकली बुद्ध ने पूछा- यह क्या हुआ तो जवाब था- यह मर गया है बुद्ध ने पूछा-क्या मैं भी मर जाऊंगा? जीवन के सारे तथ्य मैं से संबंधित हो जाएं तो क्रांति हो जाती है।

उसने कहा- मैं कैसे कहूं अपने मुंह से, लेकिन कोई भी अपवाद नहीं हो सकता है। मरना ही होगा। जन्मा है वह मरेगा ही। बुद्ध ने कहा- फिर मैं मर गया। मुर्दे महोत्सव में नहीं जाया करते हैं। इसलिए सब मुर्दे हैं। रथ वापस लौटा लिया गया और उस युवक की (बुद्ध) जिंदगी में क्रांति हो गई। जीवन की सच्चाई यही है कि व्यक्ति भ्रम में जीता है वह उसके आस-पास घटने वाली रोज की घटनाओं से कुछ नहीं सीखता है, यही उसकी त्रासदी है।
प्रेरणा बिन्दु:-
जीवन की सच्चाई जीने में नहीं, मृत्यु को समझने में है।




from Opinion - samacharjagat.com
आगे पढ़े -समचरजगत

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