गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण का विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारि - social Gyan

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गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण का विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारि

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सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण देने से जुड़े विधेयक को मंगलवार की देर रात लोकसभा में दो तिहाई बहुमत से पारित हो गया। 124वें संविधान संशोधन विधेयक के समर्थन में 323 वोट पड़े, जबकि विरोध में मात्र तीन। लोकसभा में 5 घंटे चली बहस में 30 से अधिक सांसदों ने भाग लिया। लोकसभा में हुई बहस में एआईएमआईएम, अन्नाद्रमुक और राजद को छोड़ सभी दलों ने समर्थन किया। इसी विधेयक को संसद में पारित कराने के लिए राज्यसभा का शीतकालीन सत्र एक दिन बढ़ा दिया गया और बुधवार को यह विधेयक राज्यसभा में पेश कर दिया।

देर रात तक राज्यसभा में हुई बहस के बाद वोटिंग में विधेयक के पक्ष में 165 वोट पड़े, जबकि खिलाफ में मात्र 7 वोट मिले। इससे पहले विधेयक को प्रवर समिति को सौंपने और उसमें संशोधन संबंधी सभी प्रस्ताव वोटिंग के बाद खारिज कर दिए गए। अब विधेयक राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। लोकसभा में इस विधेयक के पक्ष में 17 दल थे। आरक्षण का समर्थन करने वाली 17 पार्टियों के कुल 92 फीसदी सांसद है, जबकि संशोधन विधेयक के लिए 67 फीसदी की ही जरूरत थी। विधेयक का समर्थन करने वाली 17 पार्टियों के कुल 472 सांसद है। इनमें कांग्रेस (45), तृणमूल कांग्रेस (34), तेलुगुदेशम पार्टी (टीडीपी) 15, वामदल 9 आदि शामिल है। इनमें कई गैर हाजिर भी थे। विरोध करने वाले दलों एमआईडीएमके, एआईएमआईएम और राजद के कुल 42 सांसद है। यानी सिर्फ 8 फीसदी, जबकि समर्थन में 92 फीसदी सांसद थे। बुधवार को राज्यसभा में संविधान संशोधन के विधेयक को पेश कर दिया है।

लोकसभा में इस विधेयक का विरोध करने वाले दलों के राज्यसभा में 18 सांसद है। इनमें एआईडीएमके (अन्नाद्रमुक) के 13 और राजद के 5 सांसद है, जबकि एआईएमआईएम का एक भी सांसद नहीं है। लोकसभा में इस संविधान संशोधन का विरोध करने वाली तीन पार्टियों में एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि यह संविधान के साथ धोखा है। आंबेडकर का अपमान है। क्या सवर्णों ने कभी छुआछूत या भेदभाव का सामना किया है। राजद के जयप्रकाश यादव ने सरकार से जातीय जनगणना करवाने की मांग की और फिर जिस जाति की आबादी जितनी है, उसे उतना कोटा दे। उनकी यह भी मांग थी कि ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) दलित, अति पिछड़ा वर्ग को 85 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए।

अन्नाद्रमुक के एम, थंबीदुरई ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को कोटा देने का मतलब यह हुआ कि 4 साल में गरीबी उन्मूलन की आधा दर्जन योजनाएं विफल रही है। यहां यह बता दें कि देशभर में सवर्ण जातियां आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करती आ रही है। भारतीय संविधान में आरक्षण का आधार आर्थिक निर्बलता न होकर सामाजिक भेदभाव व शैक्षणिक पिछड़ापन है। संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने हरिजन समाज की जातियों को सूचीबद्ध करके जिस आरक्षण की व्यवस्था की थी, वह पूरी तरह से इस समाज के साथ हिन्दू समाज के भीतर सदियों से चले आ रहे पशुवत व्यवहार की तरह था। यह व्यवहार इतना कू्रर था कि दलित समाज के लोगों को मानवीय अधिकारों से पूरी तरह वंचित रखता था और उन्हें पशु से भी बदतर तीसरे पायदान पर खड़ा करता था। इसी प्रकार संविधान सभा के सदस्य कैप्टन जयपाल सिंह ने आदिवासियों का मामला उठाया था और उनके लिए भी आरक्षण की व्यवस्था करवाई थी।

इन तबकों को आरक्षण इसलिए नहीं दिया गया था कि वे आर्थिक रूप से भी सबसे निचले पायदान पर खड़े थे, बल्कि इसलिए दिया गया था कि वे हिन्दू समाज के अंग होकर भी उसकी खींची हुई उन लकीरों से बाहर थे, जो मनुष्य जाति देखकर उसके मनुष्य होने का निर्धारण करती थी। देश के राजनीतिक अजेंडे में दलित और आदिवासियों का स्थान बड़ा ऊंचा है। प्राय: हर राजनीतिक दल उनकी हालत सुधारने का वादा करती है या उनके साथ हो रहे भेदभाव का मुद्दा उठाती है। लेकिन उनकी सामाजिक स्थिति को देखें तो निराशा होती है। आज भी यह तबका समाज में नीच समझे जाने वाले पेशे में ही लगा है। अच्छी नौकरियां उनके लिए सपना ही है। गैर कृषि श्रम से संबंधित जनगणना के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं। निजी क्षेत्र में उनकी उपस्थिति लगभग नगण्य है। कॉरपोरेट सेक्टर में मैनेजर स्तर पर 93 प्रतिशत गैर दलित आदिवासी लोग हैं। हां सरकारी नौकरियों में अलबता उनकी स्थिति कुछ बेहतर है।

सरकारी स्कूलों में काम करने वाले दलितों की संख्या 8.9 फीसदी है और अस्पतालों में 9.3 प्रतिशत है। पुलिस में दलितों की संख्या 13.7 फीसदी है, जबकि आदिवासियों की तादाद 9.3 फीसदी है। आज भी झाडू लगाने और चमड़े के काम करने वालों में दलितों की बहुतायत है। लोकसभा द्वारा पारित 124वें संविधान संशोधन विधेयक के तहत मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय के गरीबों को भी आरक्षण मिलेगा। यहां यह बता देें कि सामान्य वर्गों के गरीबों आरक्षण देने का मामला पहली बार नहीं हुआ है। सितंबर 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार ने भी ऐसा ही आदेश जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट में उसे चुनौती दी गई। 1992 के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बैंच ने सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए आरक्षण को दो आधार पर अवैध और असंवैधानिक घोषित किया। पहला यह कि संविधान में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है।

केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण, संविधान के प्रावधानों व आरक्षण की भावना के खिलाफ है। दूसरा यह कि आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण से यह कुल 59 फीसदी हो जाएगा जो सुप्रीम कोर्ट की तय सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा है। जो आपत्ति तब थी, वह आज भी मान्य है। सरकार ने इस आरक्षण के लिए जो गरीब की परिभाषा बनाई है, वह अजीब है। जो इनकम टैक्स में 8 लाख या कम आमदनी दिखाए या जिसके पास 5 एकड़ या कम जमीन हो या बड़ा मकान न हो। उन सबको गरीब माना जाएगा। मतलब यह कि हर महीने एक लाख से अधिक तनख्वाह पाने वाले या बहुत बड़े किसानों और व्यापारियों को छोडक़र लगभग सभी सामान्य वर्ग के लोग इस आरक्षण के हकदार हो जाएंगे।

इसका सीधा सा अर्थ है कि मजदूरी करने वाले, ठेले और रिक्शा चलाने वालों के बच्चों को वकीलों और शिक्षकों के बच्चों के साथ इस 10 फीसदी आरक्षण के लिए मुकाबला करना होगा। इस प्रकार इस आरक्षण से सामान्य वर्ग के वास्तविक गरीबों को कोई फायदा नहीं होगा। वैसे अभी इस विधेयक को लागू करने में दिक्कत आएगी। संसद के दोनों सदनों द्वारा दो तिहाई बहुमत से पारित किए जाने के बाद इसे देश की कम से कम 50 प्रतिशत विधानसभाओं में भी पारित कराना पड़ेगा। संविधान में आरक्षण की जो व्यवस्था है वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए है। आर्थिक आधार पर आरक्षण की नहीं। ऐसे में संशोधन हो भी गया तो भी सुप्रीम कोर्ट उसे खारिज कर सकता है।




from Opinion - samacharjagat.com
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