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अग्रणी अर्थशास्त्रियों ने देश के लिए आदर्श आर्थिक रणनीति सुझाई

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रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन सहित 13 अग्रणी अर्थशास्त्रियों ने देश के लिए जो आदर्श आर्थिक रणनीति सुझाई है। उसे व्यापक राजनीतिक विमर्श में लाया जाना चाहिए। इन विशेषज्ञों की यह महत्वपूर्ण पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब राजनीति में चर्चा का स्तर काफी छिछला हो गया है। अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों के इन जानकारों के बीच आम सहमति पर आधारित ;आर्थिक रणनीति शीर्षक इस पत्रक से राय यह उभरती है कि देश जिन चुनौतियों से गुजर रहा है, उनमें तीन सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है-रोजगार, किसान और पर्यावरण। दुर्भाग्यवश पर्यावरण को अभी तात्कालिक महत्व के सवालों में नहीं गिना जाता।

उसके बारे में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खूब बोला जाता है, लेकिन बड़े आर्थिक फैसले लेते वक्त इस पर सोचने की जरूरत नहीं महसूस की जाती। रणनीति पत्र पर्यावरण को लेकर एक ऐसा स्वतंत्र नियामक गठित करने की जरूरत बताता है, जिसे सिर्फ महाभियोग के जरिए ही पद से हटाया जा सके। मकसद यह है कि देश का राजनीतिक नेतृत्व पर्यावरण संबंधी चिंताओं को अपनी सुविधा और जरूरत के मुताबिक मनचाहे ढंग से मुल्तवी न कृषि संकट की गंभीरता को रेखांकित करते हुए भी यह रणनीति पत्र कर्ज माफी का पुरजोर विरोध करता है। रघुराम राजन की राय है कि चुनाव आयोग राजनीतिक दलों को चुनाव में किसानों को कर्ज माफी जैसे वादे ही न करने दें। इन आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि कर्ज माफी के बजाए किसानों की आमदनी बढ़ाना और ग्रामीण रोजगार योजना पर जोर देना देश के लिए ज्यादा कारगर विकल्प है। कर्ज माफी जैसे कदम वित्तीय और चालू खाते का घाटा बढ़ा देते हैं, जिससे आर्थिक स्थिरता के मोर्चे पर समस्याएं बढ़ने लगती है। रणनीति पत्र रोजगार की कमी को गंभीरता से रेखांकित करते हुए कहता है कि देश में सालाना एक से सवा करोड़ रोजगार सृजित किए जाने जरूरी है।

जबकि फिलहाल इसका एक बृहद छोटा हिस्सा ही सृजित हो पा रहा है। इन अर्थशास्त्रियों ने यह भी गौर किया है कि निजी क्षेत्र में बढ़ती असुरक्षा और बदतर होती सेवा शर्तों के चलते, ज्यादातर युवा सरकारी नौकरियों में घुसने की कोशिश में लगे रहते हैं और इस क्रम में अपने कई साल बर्बाद कर देते हैं। रणनीति पत्र बड़े पैमाने पर अर्ध कुशल नौकरियों की गुंजाइश बनाने वर्क फोर्स में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और तटीय क्षेत्रों से दूर के इलाकों में रोजगार उपलब्ध कराने की जरूरत को अलग से रेखांकित करता है। इस दस्तावेज की सबसे खास बात यह है कि यह आर्थिक विकास को महज आंकड़ों में नहीं देखता। इसका जोर आर्थिक विकास से सामान्य लोगों को मिलने वाले ठोस फायदों पर है। इसलिए यह बहुत जरूरी है। कि इसे कुछ अर्थशास्त्रियों की निजी राय के रूप में लेने के बजाए राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन अपनी अंदरूनी बहस का मुद्दा बनाए।

हालांकि इस रणनीतिक पत्र में आर्थिक विकास को महज आंकड़ों में देखने के बजाए सामान्य लोगों को मिलने वाले ठोस फायदों पर है, किन्तु केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने वर्ष 2018-19 के लिए जीडीपी ग्रोथ रेट का पहला अनुमान सोमवार को जारी किया है, जिसके अनुसार इस साल जीडीपी ग्रोथ 7.2 फीसदी रहने की उम्मीद जताई है। यह तीन साल में सबसे अधिक होगी। पिछले साल विकास दर 6.7 फीसदी थी। विशेषज्ञों के अनुसार जीडीपी ग्रोथ रिजर्व बैंक के अनुमान 7.4 फीसदी से कम रहने के कारण सरकार का घाटा लक्ष्य से अधिक रह सकता है। सरकार ने इस साल बजट में 3.3 फीसदी राजकोषीय घाटे का लक्ष्य रखा है, लेकिन विशेषज्ञ मानकर चल रहे हैं कि 3.5 फीसदी तक पहुंच सकता है।




from Opinion - samacharjagat.com
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