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मनरेगा में मांगने के बावजूद 32 फीसदी लोगों को काम नहीं मिला

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कांग्रेसनीत संप्रग (यूपीए) सरकार के दौरान गांवों में साल में 100 दिन रोजगार देने की गारंटी वाली महत्वाकांक्षी योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत लोगों को समुचित काम नहीं दिए जाने पर सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई है। भाजपानीत एनडीए (राजग) सरकार ने मनरेगा के बजट में कटौती कर दी है। जिसका असर सामने आने लगा है। मनरेगा को लेकर काम करने वाले चुनिंदा बुद्धिजीवियों और अर्थशास्त्रियों ने इस बारे मेें चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा है और उनसे तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने आशंका जताई है कि जल्द ही कोई कदम नहीं उठाया गया तो ग्रामीण क्षेत्रों को बड़ी आबादी भुखमरी की भी शिकार हो सकती है।

पीपुल्स एक्शन फॉर एम्पलॉयमेंट गारंटी (पीएईजी), नरेगा संघर्ष मोर्चा और समृद्ध भारत ने कहा कि इस साल सरकार द्वारा मनरेगा के लिए जारी बजट का 99 फीसदी पैसा खत्म हो चुका है, जबकि अभी तीन माह और शेष है। इन संगठनों ने बीते सप्ताह कहा कि वर्ष 2017-18 में मांगने के बावजूद 32 फीसदी लोगों को मनरेगा के तहत काम नहीं मिला। जबकि यह योजना गांवों में रोजगार मुहैया कराने की गारंटी देने के लिए शुरू की गई थी। बीते सप्ताह शुक्रवार को दिल्ली में अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक जयंति घोष और मनरेगा कार्यकर्ता निखिल डे ने मनरेगा की स्थिति को लेकर कई प्रकार के दस्तावेज जारी किए। प्रभात पटनायक और जयंति घोष ने कहा कि वित्तीय वर्ष के समापन से तीन महीने पहले ही मनरेगा में आवंटित मद का 99 फीसदी खत्म हो गया है। मनरेगा कार्यकर्ताओं पर एफआईआर दर्ज किए जाने, ज्यादातर मजदूरों को उनकी मजदूरी तय समय में नहीं मिलने। कई राज्यों में मनरेगा में काम बंद होने से यह महत्वाकांक्षी योजना दम तोड़ने को है। सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे के मुताबिक एक पत्र के जरिए प्रधानमंत्री को हालात की जानकारी दी गई है।

प्रधानमंत्री को पत्र लिखने वालों में सांसद करण सिंह यादव जो इसी वर्ष उपचुनाव में राजस्थान से लोकसभा की अलवर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीते है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान, योजना आयोग की सदस्य रही सैय्यदा हमीद, सांसद दिग्विजय सिंह, सांसद दीपेन्द्र हुड्डा, वृंदा करात, जिग्नेश मेवाणी, सीताराम येचुरी, अरुणा राय, योगेन्द्र यादव सहित 21 बुद्धिजीवी शामिल है। इन सभी ने कहा है कि कई जगह मनरेगा का काम बंद हो गया है। गांवों के गरीब तबके भुखमरी के चपेट में आए, इससे पहले सरकार को इस बावत तुरंत ध्यान देना चाहिए। अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने कहा कि कम से कम 100 दिन का रोजगार पाने का अधिकार संसद ने नागरिकों को दे रखा है।

हालात यह है कि देश के सात राज्य सूखे की चपेट में है। 8 करोड़ लोगों को रोजगार देने वाली मनरेगा योजना को अघोषित रूप से खत्म करना महिलाओं और दलितों के लिए भी घातक है। रोजगार पाने वालों में आधे से ज्यादा महिलाएं है। अगर सरकार ने तुरंत सकारात्मक कदम नहीं उठाए तो गांवों में अराजक स्थिति बन जाएगी। जयंति घोष ने विश्व बैंक का हवाला देते हुए कहा कि मनरेगा पर कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.7 फीसदी का आवंटन होना चाहिए, लेकिन सरकार ने अब तक का सबसे कम 0.38 फीसदी धन आवंटित किया। मनरेगा पर काम कर रहे शोधार्थी राजेन्द्र ने दावा किया कि भुगतान को लेकर सरकार के दावे गलत है। 3500 पंचायतों के सर्वे का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 2017-18 में केवल 32 फीसदी मजदूरों को उनकी मजदूरी तय समय पर मिली।

2017-18 में भुखमरी के 74 मामले दर्ज हुए है, जिन्हें मनरेगा से जोडक़र देखने की जरूरत है। सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के शोधार्थियों की टीम द्वारा 3500 ग्राम पंचायतों मेें किए गए सर्वे का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2017-18 में मांगने के बावजूद 32 फीसदी लोगों को मनरेगा के तहत काम नहीं मिला। शोधार्थियों की टीम ने 10 राज्यों की 3500 ग्राम पंचायतों में गए और आंकड़े जुटाए। उन्होंने बताया कि मनरेगा के तहत काम करने वाले 82 फीसदी लोग काफी निम्न आय वर्ग के थे। साथ ही कहा कि मनरेगा के तहत काम करने वाले लोगों को काफी समय बाद पैसा मिलता है। जबकि सरकार का दावा है कि भुगतान में कोई देरी नहीं होती है। सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे का कहना है कि सरकार ने इस साल के लिए अब तक कोई अतिरिक्त धन नहीं दिया है। ऐसे में यह चिंता की बात है कि आगे लोगों को कैसे काम मिलेगा? जबकि वित्तीय वर्ष के अभी तीन माह बाकी है। धन की कमी है। उनका यह भी कहना है कि यदि लोगों को रोजगार दिया भी जाएगा तो उन्हें पैसे कहां से मिलेेंगे क्योंकि सरकार द्वारा जारी धन खत्म होने के कगार पर है।

इन संगठनों ने बीते गुरुवार को बिहार, गुजरात, हरियाणा, राजस्थान सहित कई राज्यों के सांसदों व विधायकों के साथ इस मसले पर कंस्टीट्यूशन क्लब में बैठक की। इस बैठक में कांग्रेस, माकपा व अन्य दलों के प्रतिनिधियों के अलावा कई राज्यों के काफी संख्या में आए सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हुए। इसमें मनरेगा को प्रभावी बनाने के लिए संसद सदस्यों ने प्रधानमंत्री को पत्र भेजने का निर्णय लिया। विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों और विधायकों के साथ बैठक के दौरान कांग्रेस नेता के. राजू ने कहा मनरेगा का मुद्दा हमारे चुनाव घोषणा-पत्र में प्रमुख रूप से होगा। कांग्रेस शासित 5 राज्यों में मनरेगा मिशन के तौर पर लागू किया जाएगा।

गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवानी ने कहा कि मनरेगा के तहत 100 दिन के बजाए लोगों को 200 दिन का रोजगार मिलना चाहिए। एक ओर जहां मनरेगा को लेकर नई दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में बीते गुरुवार को विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों की बैठक हुई वहीं राजस्थान जयपुर स्थित सचिवालय में भी ठीक उसी दिन ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग के अधिकारियों के साथ उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने साढ़े तीन घंटे बैठक की। बैठक में बताया गया कि राजस्थान में मनरेगा योजना में इस साल दिसंबर तक सिर्फ 50 हजार परिवारों को ही 100 दिन का रोजगार सरकार दिला सकी है। पिछले साल की तुलना में ऐसे परिवारों की संख्या 75 फीसदी से कम रही है। पायलट ने मनरेगा सहित धीमी गति से चल रही योजनाओं पर चिंता जताई और ऐसी कार्य योजना बनाने के निर्देश दिए ताकि अधिक से अधिक लोगों को रोजगार के अवसर मिल सके।

योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए 5 से 20 जनवरी तक पंचायत स्तर पर विशेष शिविर लगाए जाएं। यहां यह बता दें कि मनरेगा में पिछले वित्तीय वर्ष में 2 लाख से ज्यादा परिवारों को रोजगार दिया गया था। इस बार सिर्फ 50 हजार परिवार ही लाभान्वित किए जा सके। प्रदेश में 97 लाख से ज्यादा जॉब कार्डधारी है। पायलट ने जिला परिषद सीईओ व विकास अधिकारी को सघन दौरा कर शिविरों का आयोजन कर रोजगार की मांग करने वाले पात्र लोगों से प्रपत्र-6 भरवाकर रसीद देने के निर्देश दिए ताक श्रमिक को 15 दिन में रोजगार मिल सके।




from Opinion - samacharjagat.com
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