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सबसे पहले खुद को संभाले

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बिना समझ के बिना विचारे और बिना अपनी भावनाओं को जाने किसी की हौड करना, अंधानुकरण करना न केवल घातक है बल्कि आत्मधाती भी है ऐसा करने से टकरारे बढती जाती है इज्जत कम होती जाती है और एक समय आता है कि जिस जीवन को जीने के लिए हम आये थे उसी का मूल मकसद ही भूल गये। एक कहानी है एक कर एक सन्यासी मरणासन्न था उसके बहुत सारे शिष्य उसके आस पास बैठे हुए थे। वे सभी रूआंसे और सुखी थे।

यह स्वयं को अनाथ और असहाय समझ रहे थे। वे मन ही मन कह रहे थे कि अब हम क्या करेंगे हमारे गुरूजी के बिना। उनमें से एक में हिम्मत करके अपने गुरूजी से पूछ है महाराज हम अब कैसे जीयेंगे कोई जीवन का सारगर्मित संदेश करने का श्रम करें। यह महत्वपूर्ण संदेश मेरे गुरूजी के मुझे मरने दिया था लेकिन मैंने अपने महान गुरूजी की बात को नहीं माना और उसी के कारण मैं आज पश्चाताप की अग्रि में जलता हुआ मर रहा हूॅ विस्तार और अहंकार से भरा जीवन जी रहा है मेरा अब मैं कुछ नहीं कर सकता।

शिष्यों ने बडी हैरानी से पूछा कि जीवन और बिल्ली पालने का क्या सम्बन्ध है। इनकी बुद्धिसठिया गई है ये यौ ही बक रहे हैं। वे केले इसे खोलकर समझाये महाराज इस इहस्य क्या है। संयासी ने कहना शुरू किया मैं भी एक आम आदमी और साधारण गृ़हस्थी था सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था किसी दिन मेरे गांव के पास वाले कस्बे में एक संसासी का प्रवचन था मै उसमें शामिल हुआ और मुझे भी संयासी बनने का शौक हो गया। मैं चुपचाप घर से निकल गया और तलाशते तलाशते उसी संयासी के पास पहुंच गया और उनका शिष्य बन गया। एक दिन वे मेरी स्थिति में थे मैंने उनसे जीवन का संदेश पूछा तो उन्होंने कहा था कभी जीवन में बिल्ली मत पालना।

गांव वालों ने सुझाव दिया कि एक बिल्ली ही इसका सही इलाज है मैंने गांव वालों की बात मानकर एक बिल्ली पाल ली। अब चूहे नहीं आते थे लेकिन बिल्ली भूखी रहती थी। मैंने यह बात गांव वालों से कही गांववालों ने सुझाव दिया कि महाराज एक गाय पाल ले गाय के छूध से बिल्ली का पेट तो भरेगा ही साथ साथ आपको गौ सेवा का भी धर्म लगेगा। मैंने गांव वालों सुझाव को मान लिया और एक गाय रख ली। अब मेरे सामने एक नई समस्या खडी हो गई कि गाय भूखी रहने लगी। इसके लिए गांव वालों ने मुझे खेत का एक टुकडा दे दिया। मैंने सोचा कि मैं दिन भर बैठा बैठा क्या करूंगा चलो खेत में काम करूंगा तो घास और अनाज दोनों मिल जायेंगे।

मैं ऐसा करने लगा। गांव में एक विधा थी वह कई लोगों के साथ मेरे यहां आती थी किसी ने कहा कि महाराज इस विधवा से शादी कर लो इससे खेती गाय बिल्ली और आपकी देखभाल अच्छे से हो जायेगी। मैंने उसकी बात मान ली। मेरे बाल बच्चों हो गये। मेरे इन करतूतों से आस पास के गांवों मूें रोष फैल गया मुझे वहां से निकाल दिया गया और मैं अब आपके सामने पश्चाताप की आग में जल रहा हूॅ। प्रिय शिष्यों अपने आपको संभाल कर रखना तभी संसार संभाल पाओंगे।

प्रेरण बिन्दु:-
घर संभाले अच्छी बात है समाज संभाले अच्छी बात है देश दुनिया संभाले बहुत अच्छी बात है लेकिन सबसे पहले खुद को संभालना सबसे अच्छी बात है।




from Opinion - samacharjagat.com
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