डॉ. अम्बेडकर का जीवन-दर्शन - social Gyan

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डॉ. अम्बेडकर का जीवन-दर्शन

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डॉ. अम्बेडकर का जिस काल-खण्ड में जन्म हुआ वह परिवर्तन व जनजागरण का युग था। विश्व में साम्राज्यवाद के पतन के साथ ही अविकसित देशों में भी जनतंत्रीय व्यवस्था के ध्वज एक-एक करके फहराते जा रहे थे। भारत में इस काल में सामाजिक व्यवस्था पूर्णतया विकृत अवस्था में थी। निम्न जाति में जन्म लेने के कारण स्कूल में भी बैठने के लिए घर से टाट-पट्टी ले जानी पड़ती थी। एक कौने में निम्न जातियों के बच्चों को बैठाया जाता था। पानी की भी अलग व्यवस्था थी। उच्चवर्ग बच्चों में वे घुलमिल नहीं सकते थे। पग-पग पर होने वाले अपमान दुव्र्यवहार पक्षपात ने अम्बेडकर को शिक्षा की डगर से विचलित नहीं किया। महाराजा बड़ोदा ने उन्हें अमरीका भेजा। उन्होंने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से सन् 1915 में अर्थशास्त्र में एम.ए. किया और इंगलैण्ड से कानून की शिक्षा प्राप्त की।

अपने शैशव काल से लेकर निरन्तर उन्होंने अन्याय, अत्याचार शोषण और भेदभाव देखा, अवज्ञा, अवहेलना और अवमानना का सामना किया और इसी कारण वे हिन्दू समाज में जाति व्यवस्था पर आधारित अन्यायों और विषमताओं का प्रतिवाद प्रतिकार और मूलोच्छेद करने को खड़े हुए। उनकी शिक्षा, विद्घता और नेतृत्व क्षमता ने उनको दलित वर्ग का जुझारु मसीहा बना दिया।
डॉ. अम्बेडकर के लिए निम्न जातियों से किया जाने वाला पशु समान व्यवहार असहनीय था। उन्हें बर्दास्त नहीं था निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए थोड़े से लोग करोड़ों अछूतों को पशुओंं से भी निकृष्ट जीवन जीने के लिए बाध्य करें। वे हिन्दू समाज में व्यात घृणा, ऊंच-नीच, जाति-पाति कर्मकाण्ड आदि को समाप्त कर एक आदर्श समाज की स्थापना करना चाहते थे। अपने इस ध्येय की प्राप्ति के लिए डॉ.अम्बेडकर ने अपना पूरा जीवन उत्सर्ग कर दिया। वे चाहते थे कि दलित उन पर थोपी गई सभी निर्याेग्यताओं से मुक्त होकर सम्मानजनक जीवन व्यतीत करें। उन्होंने कई संगठन बनायें, अनेक प्रदर्शन व आंदोलन किये। उन्होंने महात्मा बुद्घ के मानववादी विचारों से प्रभावित होकर बौद्घ धर्म ग्रहण किया।

डॉ. अम्बेडकर का कथन था हिन्दू धर्म मे एक वर्ण को ज्ञान प्राप्त करने दूसरे को शस्त्र प्रयोग करने व राज्य करने, तीसरे को व्यापार करने और चौथे वर्ण को केवल दूसरो की सेवा करते रहने की व्यवस्था है। जो धर्म केवल कुछ लोगों को शिक्षा का लाभ उठाने की अनुमति देता है और शेष को निरक्षर और अज्ञानी बनाए रखना चाहता है, यह धर्म नहीं अपितु एक वर्ग को समाज का शाश्वत दास बनाऐ रखने का प्रयास है। वह धर्म जो जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरों पर आश्रित रहने को बाध्य करता है धर्म नहीं स्वार्थपरता है।

डॉ. अम्बेडकर का कथन था कि ;;आध्यात्मिक और भौतिक रूप से स्वतंत्र और सुदृढ़ होने के लिए व्यक्ति का शक्ति सम्पन्न होना अनिवार्य है। उन्होंने कहा था कि श्रमिक व सेवक वर्ग के पास जनशक्ति, धनशक्ति और मानसिक शक्ति, इनमें एक भी नहीं है।

इनकी मान्यता थी कि सामाजिक फूट ने देश को विदेशी शासको का गुलाम बनाया और देश की उन्नति व समृद्घि में बाधा उत्पन्न की। अत: देश की समृद्घि और प्रजातंत्र की रक्षा के लिए सामाजिक बदलाव आवश्यक है। डॉ. अम्बेडकर पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने दलितों को अपने पांव पर खड़ा होकर अपने हको के लिए लडऩे के लिये प्रेरित किया। उन्होंने स्पष्ट कहा था ;;इस दीन-हीन और दयनीय दशा में जीने से तो मरना बेहतर है, इस दशा में जीकर तुम इस दुनिया में गरीबी, दु:ख और गुलामी का बोझ बढ़ा रहे हो, यदि तुम उन्नति नहीं कर सकते हो और अपनी बंदिशें स्वयं नहीं तोड़ सकते हो तो मुत्यु का वरण कर इस दुनिया के भार को हल्का कर सकते हो। उन्होंने यह भी कहा था ;;खोये हुए अधिकार मांगने या अपील करने से वापस नहीं मिलते, अधिकार मिलते है, सतत संघर्ष करने से। बली भेड़ों की दी जाती है, शेरों की नहीं, इसलिए शेर बनने का प्रयास करों।

महात्मा गांधी व डॉ. अम्बेडकर के बीच पूना में समझौता हुआ, जिससे ;;पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। उसमें सत्ता में भागीदारी के अधिकार दिये जाने की बात सिद्घांत: स्वीकार की गई थी। डॉ. अम्बेडकर व्यवहारिक व व्यवसायिक स्वतंत्रता के पक्षधर थे। वे केवल ;;कार्ल माक्र्स के भौतिक विकास के पक्षधर नहीं थे। डॉ. अम्बेडकर का यह मत था कि ;;भौतिक विकास के साथ-साथ यदि व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास नहीं होता है तो वह पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता।

संविधान सभा की प्रारूप समिति का उन्हें अध्यक्ष बनाया गया, कई देशों के संविधानों के अध्ययन के उपरान्त बाबा साहब ने संविधान का प्रारूप तैयार किया और संविधान सभा में प्रत्येक अनुच्छेद की सार्थकता बाबत तर्क संगत साबित किया। उन्होंने विभिन्न भाषाओं, धर्मो, संस्कृतियों वाले इस विशाल देश की शासन व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए संविधान के रूप में एक बेजोड़ दस्तावेज तैयार किया।

संविधान सभा में संविधान बनाने का काम उन्हें महात्मा गांधी द्वारा दिलाया गया। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ.राजेन्द्र प्रसाद ने अपने समापन भाषण में कहा था ;;अध्यक्ष के रूप में प्रतिदिन कुर्सी पर बैठे मैंने किसी दूसरे व्यक्ति की अपेक्षा ज्यादा अच्छे ढंग से यह बात देखी कि प्रारूप समिति और इसके सभापति डॉ. अम्बेडकर ने अस्वस्थ होते हुए भी बहुत उत्साह और लगन से काम किया। हमने डॉ.अम्बेडकर को प्रारूप समिति में लेने और इसका सभापति बनाने का जो निर्णय लिया था, हम उससे बेहतर और ज्यादा अच्छा निर्णय नहीं ले सकते थे। इन्होंने न केवल अपने चुने जाने को सार्थक बनाया अपितु जो काम इन्होंने किया उसमें चार चांद लगा दिये हैं।

तथा डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि ;;उन्हें संविधान निर्माण का जो महान कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ वह सभी दलित वर्ग के लिए भूषणीय है। साथ ही डॉ. अम्बेडकर ने स्पष्ट कहा था कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा हो यदि उसे क्रियान्वित करने वाले लोग बुरे है तो वह नि:संदेह बुरा हो जाता है। उन्होंने कहा था ;;संविधान को अमली जामा पहनाना पूर्णतया संविधान के प्रकार पर निर्भर नहीं करता, बल्कि वह निर्भर करता है जनता और उसके द्वारा स्थापित राजनैतिक पक्ष पर जो उसकी इच्छा और नीति का पालन करने के साधन होते है। डॉ. अम्बेडकर ने धर्म के आधार पर देश के विभाजन को गलत बताया था। उनका कहना था कि यदि धर्म के आधार पर देश का बंटवारा होता है तो धर्म के आधार पर आबादी की भी अदला-बदली होना आवश्यक है और यदि ऐसा नहीं होता तो भविष्य मे ंदोनों देशों में सांप्रदायिक तनाव बना रहेगा।

डॉ. अम्बेडकर जाति विहीन व वर्ग विहीन समाज व्यवस्था चाहते थे। देश की शासन व्यवस्था लोक-कल्याणकारी हो, जिसमें सभी को फलनें-फूलनें का समान अवसर मिले, इसके वे पक्षधर थे। वे चाहते थे कि पूंजी का विकेन्द्रीयकरण हो और अवसर की समानता सभी को समान रूप से प्राप्त हो। उनके विचार आज भी सार्थक हैं। उन्होंने अंतिम समय में कहा था कि ;;लोग मुझे समझ नहीं पा रहे है, लेकिन हो सकता है कि मेरे न रहने के बाद लोग मेरी बात समझें। वे युग पुरुष थे और उनकी महानता, विद्वता का लोहा सभी ने माना है।
(ये लेखक के निजी विचार है)




from Opinion - samacharjagat.com
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