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वादे, बिना इरादे!

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राजस्थान में ७ दिस्बर को होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी ने मंगलवार को अपना चुनाव घोषणापत्र जारी कर दिया। कांग्रेस ने अपना घोषणापत्र अभी तक भी जारी नहीं किया है। पांच साल पहले हुए विधानसभा चुनाव के व€क्त दोनों दलों ने १५ से २० दिन पहले अपने-अपने घोषणापत्र जारी किए थे। इस बार यह अवधि दस दिन और उससे भी कम हो गई है। यह स्थिति केवल राजस्थान की ही नहीं है। करीब-करीब यही हाल, चुनावी दौर से गुजर रहे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित चार राज्यों का है। इसे €क्या माना जाए? राजनीतिक दल रस्म अदायगी कर रहे हैं, यह कहना तो बहुत ही हल्का होगा। सच तो यह है कि वे जनता से किए जाने वाले वादों पर बचना चाहते हैं। वे घोषणापत्र को अपनी गीता, रामायण, बाइबिल और कुरान बताते तो हैं, लेकिन जिस तरह आज इन धर्मग्रंथों को घरों में शोभा की वस्तु बना कर रखा जाता है, उसी तरह की स्थिति राजनीतिक पार्टियों में घोषणापत्रों की है। हमने ‘घोषणापत्र’ जारी किया है, वे यह कहने की जगह तो रखना चाहते हैं लेकिन जनता या मतदाता को यह मौका नहीं देना चाहते कि वह उस घोषणापत्र को देखे, पढ़े। उस पर राय व्यक्त करे और उसी को आधार बना अपना कीमती वोट डाले।

राजनीतिक दल मतदाता को जाति, धर्म और क्षेत्र के दायरे में बांधकर रखना चाहते हैं। यह बंधन बहुत आसान है। वोट मिलने की इसमें पूरी गारंटी है और जीतने पर कुछ भी नहीं करने की पूरी छूट। और यह सब इसलिए है कि इसमें कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह केवल परंपरा है कि चुनाव के मौके पर हर दल चुनाव घोषणापत्र जारी करता है। आज यदि कोई दल उसे जारी न करे तो किसी भी सरकार या चुनाव आयोग की न तो हिम्मत है और न ही अधिकार कि वे उस पार्टी से पूछ भी सकें कि उसने घोषणापत्र जारी क्यों नहीं किया? और जब जारी नहीं करने पर पूछने का अधिकार नहीं, तब जारी किए घोषणापत्र को दल कैसे लागू करेगा, करेगा भी या नहीं, यह पूछने की हिम्मत या अधिकार तो बहुत दूर की बात है। उदाहरण के लिए, भाजपा राजस्थान में पांच साल से और मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में पंद्रह साल से सत्ता में है। तब क्या उनसे यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि राजस्थान में पिछले चुनाव के वक्त और अन्य दोनों राज्यों में तीन चुनावों के अवसरों पर जो घोषणापत्र जारी किए गए, उनकी €या गति, सद्गति या दुर्गति हुई?

नैतिकता का तकाजा तो यह है कि राजनीतिक दल जब भी नया घोषणापत्र जारी करें, मतदाता के सामने पिछले घोषणापत्र की क्रियान्वयन रिपोर्ट पेश करें, बताएं कि पिछले घोषणापत्र में से उन्होंने इतने वादे पूरे किए, इतने अभी अधूरे हैं और इन-इन वादों को तो वे पांच साल में टच भी नहीं कर सके। भारत की संसदीय राजनीति के इतिहास और घोषणापत्रों पर इन तमाम दलों के रवैये को देखते हुए यह उम्मीद करना बेमानी है कि वे अपने आप में कुछ सुधार करेंगे। उन्हें फॉलो करने में मतदाता की अपनी सीमाएं हैं और मीडिया का हाल तो इन दिनों दलों से भी बदतर होता जा रहा है। कारण जो भी हों, पर उनमें से ज्यादातर मतदाता को वही दिखाते हैं जो राजनीतिक दल दिखाना चाहते हैं। तब उम्मीद की किरण केवल न्यायालय और इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय दिखता है। जिस तरह उसने दागी उम्मीदवारों पर मतदान से पहले विज्ञापन के जरिये तीन बार वोटर को अपने अपराधों का Žब्यौरा बताने का आदेश दिया है, उसी तरह वह देश के तमाम दलों को चुनाव से तय अवधि पहले घोषणापत्र जारी करने और सत्ता में होने पर उसकी पालना रिपोर्ट पेश करने का आदेश दे, जिससे हालात सुधर सकें। अन्यथा तो यही मनमर्जी चलती रहेगी। जनता भावनात्मक रूप से लुटती रहेगी और दल से लूटते रहेंगे। (तकनीकी कारणों से मंगलवार के अंक में, ३० अ€टूबर को प्रकाशित अग्रलेख पुन: प्रकाशित हो गया, जिसका हमें खेद है।)




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