भावान्तर की गड़बडिय़ों से गड़बड़ाया गणित - social Gyan

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भावान्तर की गड़बडिय़ों से गड़बड़ाया गणित

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देवास से प्रदेश का मालवा अंचल शुरू होता है। इसी में इंदौर, रतलाम, उज्जैन, शाजापुर आदि जिले शामिल हैं और साथ लगते निमाड़ अंचल में खरगोन, बड़वानी, खंडवा आदि जिले हैं। इंदौर, जिसे मध्यप्रदेश की व्यावसायिक राजधानी कहा जाता है, भव्य अट्टालिकाओं, मॉल, चौड़ी सडक़ों पर दौड़ते वाहनों के चलते देश के प्रमुख नगरों की श्रेणी में आ गया है। यही इंदौर व मालवा के अन्य नगर भाजपा के गढ़ माने जाते हैं। पिछले चुनाव में इंदौर जिले की ९ सीटों में से ८ पर भाजपा ने कŽजा किया था। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन व भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय का यह प्रभाव क्षेत्र रहा है।

इस बार बड़ा बदलाव यह है कि इंदौर शहर के व्यापारी और ग्रामीण क्षेत्र के किसान, दोनों वर्गों का बड़ा हिस्सा भीतर ही भीतर नाराज है। किसान अपनी नाराजगी खुल कर प्रकट कर रहे हैं, वहीं बहुत से व्यापारी भीतर ही कांग्रेस प्रत्याशियों के साथ जुट गए हैं।

हालत यह है कि नंबर पांच विस क्षेत्र से लगभग बिना मर्जी उतारे गए कांग्रेस प्रत्याशी सत्यनारायण पटेल भी भाजपा को कड़ा मुकाबला दे रहे हैं। नंबर दो क्षेत्र विजयवर्गीय के प्रभाव का रहा है, पर अब यहां से कभी उनके दाएं हाथ रहे रमेश मेंदोला मैदान में हैं। इसी कारण विजयवर्गीय के पुत्र आकाश को भाजपा के लिए अपेक्षाकृत कमजोर माने जाने वाले नंबर तीन से टिकट मिला है। एक व्यवसायी बताते हैं कि गुंडागर्दी, झूठे वादों और चंदाखोरी से आम व्यापारी त्रस्त है। एक ‘अंडरकरंट’ शहर में है - देखो किसको झटका देता है!

उज्जैन से आगे इन्गोरिया तिराहे पर चाय की दुकान पर रुके तो छह-सात लोग इकट्ठा हो गए। दूध व्यवसायी संतोष भंडारे ने बताया कि बेरोजगारी की समस्या से पूरा क्षेत्र दुखी है। हरसोद खुर्द बस स्टैंड पर दर्जन भर युवाओं से बात हुई। ये सब भाजपा के घोषित प्रत्याशी का टिकट ऐनवक्त पर काटने से आक्रोशित हैं। भावान्तर योजना की गड़बडिय़ां हर किसान की जुबान पर हैं। आगे बडऩगर में कई प्रबुद्ध नागरिक मिले। उनका कहना था कि प्रचार के मामले में कांग्रेस, भाजपा का मुकाबला नहीं कर पा रही। भाजपा के बड़े-बड़े नेता छोटे-छोटे कस्बों तक पहुंच रहे हैं।

उज्जैन सर्किट हाउस में भाजपा और कांग्रेस के नेताओं के अलावा कई साहित्यकार-चिंतक भी भाईसाहब कोठारी से मिलने पहुंचे। प्रो. अजहर हाशमी तो रतलाम से चल कर आए। उज्जैन के बाद हमने ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की ओर रुख किया। इस क्षेत्र में ग्वालियर के अलावा भिंड, मुरैना, दतिया, शिवपुरी, श्योपुर, अशोकनगर और गुना जिले आते हैं। पूर्व सिंधिया राजपरिवार की राजमाता और भाजपा की नेता दिवंगत विजयाराजे सिंधिया व उनके पुत्र कांग्रेस नेता दिवंगत माधवराज सिंधिया की कर्मभूमि होने को कारण इस क्षेत्र में भाजपा और कांग्रेस का मिला-जुला प्रभाव रहा है।

पार्टियां अलग-अलग रही हों, पर चंबल में सिंधिया परिवार व नजदीकी लोगों का राजनीतिक वर्चस्व रहा है। नरेन्द्र सिंह तोमर, जयभान सिंह पवैया, नरोत्तम मिश्रा भी पिछले कुछ वर्षों में अग्रणी भूमिका में आए हैं। चंबल-ग्वालियर क्षेत्र की ३४ सीटों में से अभी २० पर भाजपा, १२ पर कांग्रेस का और २ पर बसपा का कŽजा है।

शिवपुरी में शहर के प्रबुद्ध नागरिकों के अलावा आसपास के गांवों से आए दर्जनों किसानों से बातचीत हुई। इससे पहले मालवानिमाड़ क्षेत्र के कुछ किसानों से इंदौर में विस्तृत चर्चा हुई थी। दोनों जगह किसानों का रोष स्पष्ट तौर पर उजागर हुआ। उनका मानना था कि भावान्तर योजना के नाम पर किसानों को ठगने के अलावा कुछ नहीं हुआ। फसल बीमा योजना को भी उन्होंने अनुपयोगी बताया। खाद की कीमत बढऩे से लागत और बढ़ गई। कुल मिलाकर परेशानी ही परेशानी। शिवपुरी में भाजपा की यशोधरा राजे के सामने कांग्रेस ने एकदम नए चेहरे को उतारा है। लोगों ने कहा कि कांग्रेस संघर्ष करने से पहले ही हार मान बैठी है पर ‘हवा’ का €या भरोसा?

दतिया जाते समय रास्ते में शिवुपरी जिले के नया अमोला में मड़ीखेड़ा बांध विस्थापित मुआवजे में मिली जमीन का मालिकाना हक नहीं मिलने को लेकर दुखी हैं। दतिया धार्मिक नगरी है। हजारों तीर्थयात्री आते हैं पर सडक़ों की हालत दयनीय है। महाकौशल और भोपाल क्षेत्र की तरह मालवा-निमाड़ और चंबल क्षेत्र में भी चुनावी घमासान तेजी पर है। कांग्रेस में बड़े समय बाद आक्रामकता देखी जा रही है। मतदान तक यह बरकरार रह जाए तो मध्यप्रदेश का सत्ता संघर्ष २०१९ के लोकसभा चुनाव पर सीधा असर डाल सकता है।




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