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पाकिस्तान को समझना होगा कि आतंकवाद का दामन छोड़ने में ही उसकी भलाई है

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बीसवें दक्षेस सम्मेलन में हिस्सा लेने का आमंत्रण दिया, जिसे भारत सरकार ने अस्वीकार कर दिया है। जाहिर है कि इसी साल होने वाले 20 वें दक्षेस सम्मेलन में भारत भाग नहीं लेगा। इससे पहले 19वां दक्षेस सम्मेलन पाकिस्तान की मेजबानी में पाकिस्तान में होने वाला था, जिसमें भारत ने भाग नहीं लेने का फैसला किया था।

भारत के अलावा दक्षेस के सदस्य अन्य राष्ट्रों ने भी उस सम्मेलन में भाग लेने से इन्कार कर दिया था जिसके कारण पाकिस्तान को सम्मेलन रद्द कर देना पड़ा था। उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ थे। पर उसके बाद पाकिस्तान में चुनाव हुए और इमरान खान नए प्रधानमंत्री बन गए। उन्होंने सरकार बनाने के बाद भारत से संबंध सुधारने का इरादा तो जाहिर किया लेकिन पाक सेना के काबू में रहने के कारण कोई ऐसा काम नहीं कर सके जिससे यह जाहिर होता कि वह भारत से पाकिस्तान के संबंध सुधारने की दिशा में वे कदम बढ़ा रहे है।

उल्टे भारतीय सीमा में आतंकवादियों की घुसपैठ बढ़ी और आतंकी सरगना हाफिज शरीफ को खुली छूट दे दी। जबकि हाफिज सईद को खूंखार आतंकी न केवल संयुक्त राष्ट्र ने बल्कि अमेरिका ने भी घोषित कर रखा था। अब चीन ने भी चीनी दूतावास पर हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान को हाफिज सईद के प्रति आगाह किया लेकिन पाकिस्तान का रवैया नहीं बदला क्योंकि सईद को बढ़ावा पाक सेना दे रही है और पाकिस्तान सरकार इमरान खान की अगुवाई में पाक सेना की कठपुतली सरकार है। इसलिए इमरान खान के शासनकाल में भी सीमा पार से आतंकियों की घुसपैठ बढ़ती गई।

भारत की धरती पर आकर आतंकी हमले किए जाने लगे। इमरान खान के सत्तासीन होने से पहले ही भारत सरकार ने एक बार नहीं कई बार पाक सरकार को स्पष्ट तौर पर कह दिया था कि आतंकवाद और वार्ता साथ -साथ नहीं चल सकती। लेकिन पाक के नए प्रधानमंत्री इमरान खान के ये बात अब तक समझ नहीं आई। वास्तविकता ये है कि भारत और पाकिस्तान का समाज साझी विरासत को धारण करता है। दोनों का एक समान इतिहास है, लेकिन दोनों के बीच परस्पर सहयोग और सद्भावना का अभाव है। दोनों देशों के रिश्ते पड़ौसियों की तरह सहज नहीं हैं और कश्मीर समस्या से शुरू होकर एक-के-बाद-एक अनेक मुद्दे दोनों देशों के संबंधों को तनावपूर्ण बनाते रहे हैं।

आज भी पहले से कहीं अधिक कटुता, परस्पर अविश्वास और एक-दूसरे के विरुद्ध घृणा अंतरराष्ट्रीय मैचों पर स्पष्ट देखी जा सकती है। असल में उड़ी में सेना के मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ज्यादा सख्त हो गई। 18 सितम्बर 2016 को जम्मू और कश्मीर के उरी सेक्टर में एलओसी के पास स्थित भारतीय सेना के स्थानीय मुख्यालय पर एक बड़ा आतंकी हमला हुआ, जिसमें भारत के 18 जवान शहीद हो गए। सैन्य बलों की कार्रवाई में सभी चार आतंकी मारे गए। यह भारतीय सेना पर किया गया लगभग 20 सालों में सबसे बड़ा हमला था। भारत सरकार ने इस आतंकी हमले को बहुत गंभीरता से लिया।

पहले हुए कई हमलों (पठानकोट आदि) की तरह इस हमले में भी आतंकवादियों के पाकिस्तान से संबंध होने के प्रमाण मिले, जिसके कारण भारतभर में पाकिस्तान के प्रति रोष प्रकट हुआ और भारत सरकार ने कई अप्रत्याशित कदम उठाए जिनसे भारत-पाकिस्तान संबंध प्रभावित हुए। भारत सरकार ने कूटनीतिक स्तर पर विश्वभर में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की मुहिम छेड़ दी। संयुक्त राष्ट्र में भारत की विदेश मंत्री ने आतंक का पोषण करने वाले देशों की भनदा की। पाकिस्तान को स्पष्ट शब्दों में कहा कि कश्मीर छीनने का सपना पूरा नहीं होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान ;खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते के साथ ही भारत ने भसधु जल संधि की समीक्षा शुरु कर दी। पाकिस्तान ने इसे युद्ध की कार्यवाही बताया और भारत के खिलाफ परमाणु हथियारों के उपयोग की धमकी दी।

संधि रद्द होने के डर से पाकिस्तान ने विश्व बैंक का दरवाजा खटखटाया। भारत ने नवंबर 2016 में इस्लामाबाद में होने वाले 19वें दक्षेस शिखर सम्मेलन का बहिष्कार करने की घोषणा की। बांग्लादेश, अफगानिस्तान व भूटान ने भी भारत का समर्थन करते हुए बहिष्कार की घोषणा की। अब जब 20 वां दक्षेस सम्मेलन होने वाला है तो उसका मेजबान श्रीलंका है। अगर श्रीलंका की ओर से आमंत्रण दिया जाता तो यह माना जाता कि मेजबान ने आमंत्रण दिया है, उसे वाजिब भी कहा जा सकता था। लेकिन पाकिस्तान सरकार की ओर से दिया गया आमंत्रण यह बताता है कि पाकिस्तान सरकार मूल मुद्दो को अनदेखी कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने संबंध सुधारने की कुचेष्टा कर रहा है।

पाकिस्तान को समझना चाहिए कि भारत और पाक के बीच मुख्य समस्या आतंकवाद है, जो न केवल पाकिस्तान में पनप रहा है और बल्कि उसी के सहारे उसने काश्मीर में अशांति फैलाने का काम किया है। जब तक पाकिस्तान सरकार और इमरान खान आतंकवाद के रास्ते को नहीं छोड़ेगा, तब तक उसके संबंध भारत से ही नहीं, अन्य पड़ौसी देशों अफगानिस्तान, इरान, श्रीलंका आदि से भी सुधर नहीं सकते। आज असलियत ये है कि पाकिस्तान विश्व में अलग थलग पड़ चुका है। चीन से अवश्य उसके अच्छे संबंध है लेकिन उसमें चीन का स्वार्थ है और जब तक पाकिस्तान चीन के स्वार्थांे की पूर्ति करता रहेगा, उससे चीन के संबंध अच्छे बने रहेंगे लेकिन जिस तेजी के साथ चीन का पाकिस्तान में हस्तक्षेप बढ़ रहा है उसके रहते वह दिन दूर नहीं जब पाकिस्तान चीन की साम्राज्यवादी लिप्साओं का शिकार हो जाएगा।

पाक को अब तक अमेरिका का आर्थिक सहयोग मिलता रहा है लेकिन अमेरिका ने भी पाकिस्तान को स्पष्ट रूप से बता दिया कि वह पाकिस्तान के रवैये से खुश नहीं है। उसे यह अहसास हो गया है कि अमेरिका से मिलने वाली यहायता को वह आतंकवाद पनपाने में इस्तेमाल कर रहा था। पाकिस्तान को यह समझ में आना चाहिए कि आतंकवाद से सारा विश्व पीडि़त है और आतंकवाद का सहारा लेकर पाकिस्तान का जिंदा रहना बहुत मुश्किल है। इस लिहाज से कहना होगा कि भारत सरकार ने दक्षेस सम्मेलन को लेकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के न्यौते को अस्वीकार कर सही कार्य किया है।




from Opinion - samacharjagat.com
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