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आईवीएफ की नई तकनीक से पुरुषों की इनफर्टिलिटी में होगा सुधार

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नए आनुवांशिकीय परीक्षणों ने पुरुष बंध्यता की जटिलताओं का पता लगाकर आईवीएफ की सफलता को बेहतर बनाया है। प्री-इम्प्लांटेशन जैनेटिक स्क्रीनिंग एक स्वस्थ और सुरक्षित गर्भाधान में मदद करती है।

बार-बार गर्भपात की स्थिति झेल रहे दंपतियों को किसी भी अन्य परीक्षण से पहले शुक्राणु विश्लेषण के बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि इस बात की काफी संभावना रहती है कि मूल कारण शुक्राणु विकृति हो। इनफर्टिलिटी विशेषज्ञ कहते हैं कि यह नई तकनीक 'प्री-इम्प्लांटेशन जैनेटिक स्क्रीनिंग भू्रण में मौजूद किसी भी आनुवांशिक गड़बड़ी की सफलतापूर्वक जांच करती है। यह गड़बड़ी खराब शुक्राणुओं की वजह से होती है।

कारगर तकनीक -
पीजीएस यानी प्री-इम्प्लांटेशन जैनेटिक स्क्रीनिंग ऐसी तकनीक है, जो किसी भी आनुवांशिक गड़बड़ी के लिए सभी 24 गुणसूत्रों को जांचती है और गर्भाधान की दर बढ़ाने के लिए सटीक परीक्षण करती है। इससे सेहतमंद, रोग-मुक्त भ्रूण को पहचाना जा सकता है और इस तरह से प्रसव पूर्व होने वाले आनुवांशिक परीक्षणों की मौजूदा समस्याओं से बचा जा सकता है।

स्वस्थ भ्रूण का चुनाव -
पीजीएस तकनीक का इस्तेमाल करके सामान्य गुणसूत्रों वाला स्वस्थ भ्रूण चुनकर उसे गर्भाशय में स्थानांतरित करके सफल गर्भाधान कराया जाता है।सिवियर मेल फैक्टर आईवीएफ की सफलता दर को तय करने में बड़ी भूमिका निभाती है। 50प्रतिशत इनफर्टिलिटी मामले ऐसे होते हैं, जिनमें एकमात्र यही कारक अथवा साथ में अन्य कारकों का संयोजन होता है। ऐसे असामान्य शुक्राणुओं की गतिशीलता, रूप और मात्रा भी असामान्य होती हैं।

बचाव बार-बार के गर्भपात से -
सिवियर मेल फैक्टर से ग्रस्त पुरुष खराब शुक्राणु उत्पादित करते हैं, जिनमें विकृत डीएनए होता है। यदि ऐसे शुक्राणु से भू्रण की रचना होती है तो वह गुणसूत्रों के हिसाब से असामान्य होगा और ऐसे भू्रण को माता के गर्भ में स्थानांतरित करने पर इम्प्लांटेशन नाकाम होगा और गर्भपात हो जाएगा। लगभग 50 प्रतिशत गर्भपात गुणसूत्रों की गड़बड़ियों के चलते होते हैं। बार-बार होने वाले मिसकैरिज में 70 प्रतिशत भू्रण गुणसूत्रीय तौर पर विकृत होते हैं और 15 प्रतिशत मरीजों में सभी भू्रण गुणसूत्रीय रूप से असामान्य होते हैं। 15 से 20 प्रतिशत मामलों में इस गुणसूत्रीय असामान्यता की वजह सिवियर मेल फैक्टर होता है।

लगभग 50 प्रतिशत गर्भपात गुणसूत्रों की गड़बडिय़ों के कारण होते हैं।
70 प्रतिशत भ्रूण खराब होते हैं, बार-बार होने वाले गर्भपात में
फिश तकनीक में कुल 24 गुणसूत्रों में से केवल 9-12 गुणसूत्रों में ही गड़बड़ी की जांच हो पाती है।

वर्कलोड भी है पुरुषों की समस्या -

भारतीय पुरुषों में फर्टिलिटी की दर में गिरावट पाई गई है। दिल्ली के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) के एक शोध के अनुसार हमारे देश में पुरुषों के बीज में प्रति मिलिलीटर शुक्राणु छह करोड़ से घटकर 2 करोड़ ही रह गए हैं। यह समस्या ग्लोबल है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के अनुसार, बीते 50 सालों में दुनिया भर के पुरुषों में शुक्राणु घटकर आधे रह गए हैं। आमतौर पर नि:संतान दंपत्तियों में पत्नियों को ही कसूरवार माना जाता है, लेकिन वैज्ञानिक सच यह है कि करीब 40 फीसदी मामलों में पुरुष इसके जिम्मेदार हैं। कामकाज का दबाव पुरुषों में नपुंसकता का सबब बन सकता है। इस समस्या के पीछे शुक्राणुओं की संख्या कम होना या शुक्राणुओं का अभाव है। अन्य कारणों में जीवनशैली संबंधी कारक जैसे ज्यादा गर्म माहौल में काम, गोद में लैपटॉप रखकर काम, मोटापा, बिना सुरक्षा के संबंध बनाना, शराब, सिगरेट का सेवन आदि हैं।




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