अर्थनीति में मतभेद - social Gyan

Post Top Ad

Responsive Ads Here

अर्थनीति में मतभेद

Share This

भारतीय रिजर्व बैंक और भारत सरकार के बीच मतभेद का बार-बार उभरना चिंताजनक और दुखद है। भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्या ने मुंबई के एक कार्यक्रम में सरकार के प्रति जैसी असंतोष भरी भावनाओं का इजहार किया है, उससे यह बात और स्पष्ट हो गई है कि सरकार और देश की सबसे बड़ी मुद्रा नियामक संस्था के बीच तालमेल संतोषजनक नहीं है। यदि हम डिप्टी गवर्नर के कथन के निहितार्थ निकालें, तो तीन बातें उल्लेखनीय हैं। पहली बात, भारत सरकार छोटे राजनीतिक स्वार्थ की वजह से 20-20 क्रिकेट शैली में मुद्रा प्रबंधन कर रही है, जबकि रिजर्व बैंक टेस्ट मैच शैली में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देना चाहता है। दूसरी बात, भारतीय रिजर्व बैंक को देश के बैंकों पर पूरी निगरानी के लिए पूरी स्वायत्ता मिलनी चाहिए। तीसरी बात, सरकार मुद्रा नीति समिति बनाकर रिजर्व बैंक की नियामक शक्ति को कमजोर करना चाहती है। ये शिकायतें पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के समय भी सामने आ गई थीं। राजन को विदा होने दिया गया, सरकार की पसंद से उर्जित पटेल रिजर्व बैंक के गवर्नर बनाए गए, लेकिन तब भी मतभेद बरकरार हैं! मतभेद के कुल १८ मामले बताए जाते हैं, जिनमें से ६ में सरकार और रिजर्व बैंक बिल्कुल आमने-सामने हैं।

मतभेद की गंभीरता इस बात से भी समझ में आती है कि डिप्टी गवर्नर मतभेद पर खुलकर बोल रहे हैं, जबकि उन्हें पता है कि ये सरकार उन्हें भी रिजर्व बैंक से चलता कर सकती है। अभिनंदन है कि खतरा उठाकर एक उच्च-ज्मिेदार केन्द्रीय बैंक अधिकारी देश के स्थिर आर्थिक हित को सरकार के राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर रखने का निवेदन कर रहा है। €या केन्द्र सरकार और देश के सश€क्त वित्त मंत्री यह निवेदन सुन रहे हैं? नीरव मोदी के देश से भागने पर जब फजीहत हुई, तो वित्त मंत्री ने रिजर्व बैंक को आड़े हाथ लेते हुए कहा था कि लोग सरकार को कोसते हैं, लेकिन नियामक संस्था को कुछ नहीं बोलते। यह बात रिजर्व बैंक के जिम्मेदार अधिकारियों को चुभनी ही थी। सच यही है कि नियामक संस्था के अधिकारी तो बैंकों के नियमन और निगरानी के लिए जरूरी अधिकार मांग रहे हैं, लेकिन सरकार अधिकारों में कटौती के उपाय कर रही है। दरअसल, सरकार का काम विकास को गति देना है और रिजर्व बैंक का काम है मुद्रा प्रबंधन। अत: मतभेद की मूल वजह यह है कि देश में विकास की स्थिति अभी बहुत अनुकूल नहीं है, भ्रष्टाचार नहीं रुक रहा है, बैंक भी मनमानी कर रहे हैं, जन-धन सुरक्षित नहीं लग रहा। ऐसे में, रिजर्व बैंक को अधिकार देकर सुधार के जरूरी काम करने देना चाहिए। किसी भी सरकार पर कई प्रकार के दबाव रहते हैं, लेकिन रिजर्व बैंक को ऐसे दबावों से दूर रखकर काम लेना चाहिए।

एक पहलू यह भी है कि मतभेदों में उलझकर सरकार और रिजर्व बैंक यह नहीं सोच रहे कि देश के लोग €या सोच रहे हैं। दो बड़ी शिकायतें हैं, जिन पर देश के लोग इन दिनों ज्यादा विचार कर रहे हैं। पहली, जिस तरह के रंग-बिरंगे ‘फेंसी’ या सजावटी कागजी नोट आ रहे हैं, आम आदमी चकित है। मुद्रा की गंभीरता प्रभावित हो रही है। दूसरी, नोटबंदी का एक फायदा डिजिटल लेन-देन को भी बताया गया था। सुविधा भी बताई गई थी और इस सुविधा को मुफ्त भी बताया गया था, लेकिन अब डिजिटल खरीदारी के लिए अलग से शुल्क वसूली शुरू होने लगी है। लोगों में चिंता है कि उनका पैसा अगर किसी नीरव मोदी के खाते में चला गया, तो उसे कौन लौटाकर लाएगा? सरकार को सोचना चाहिए कि वह लोगों के विश्वास को कैसे जीते और लौटाए। इससे भी जरूरी है कि सरकार रिजर्व बैंक और वहां बैठे अपनी पसंद के बैंकर्स पर विश्वास करे।




from Patrika : India's Leading Hindi News Portal
आगे पढ़े ----पत्रिका

No comments:

Post a Comment

Post Bottom Ad

Responsive Ads Here